मंगलवार, 24 नवंबर 2015

मजबूर परिंदा

मैं पर कटा इक
ऐसा "परिंदा" हूँ--
जो

भी
उड़ नहीं सका...!


आज की रात बड़ी
अजीब थी
क्यों कि आज फिर
आकर गिरा था
कोई परिंदा लहू में तरबतर


आँसुओं की बूंदें
काँपती रहीं
दर्द की इन्तहा पाकर


जब भी कोई
परिंदा
चीख़ता है तो
यक़ीनन
कहीं न कहीं
ख़ा
मो
शी
का समुंदर टूटता है


ना जाने कब इस
जीर्ण
देह से मुक्त हो
मैं सुलझाऊँगा
कुछ
अबूझ पहेलियाँ
लोगों की हैवानियत की


हर बार की तरह
इस बार भी
दबे क़दमों से
दर्द
आँखों की कोरों के
दरवाजे
पर दस्तक देता रहा...!


और "मैं" देर रात तक
दोनों हाथों से
चेहरे पर पड़े
क़

रों
के निशां पौंछता रहा...!!


रात ढल चुकी थी
और
आज सुबह "परिंदा"
फिर सफ़र में था.....!!




पंकज शर्मा "परिंदा"
खैर ( अलीगढ़  )
09927788180
10/11/2015

रविवार, 12 जुलाई 2015

शून्य सा अवशेष मैं....

इन शून्य विहीन आँखों से
जब निहारता में
शून्य को,
तो शून्य सा अवशेष मैं
भटक रहा
हूँ शून्य में,
इंसान भी निज स्वार्थ में
हो गया
अब शून्य है,
शून्य है बे-असर
मग़र
खो रहे सब शून्य में,
मस्तिष्क अगर हो शून्य गया
तो बिखर जाओगे
शून्य से,
आँखों में "अहम्" का
गुरूर लिऐ
खो गये अनेकों शून्य में,
सौ, हजार और लाख में
खेल है बस
शून्य का,
शून्य के इस खेल में
तुम हो रहे
सब शून्य हो,
मैं हूँ शून्य, तुम हो शून्य
सृष्ठि का उद्गम
भी शून्य,
वासुदेव भी बता गये
सब निहित है
इस शून्य में,
अर्थ विहीन, अस्तित्व रहित
ग़र है यही
शून्य तो,
आर्यभट्ट का अस्तित्व
फिर क्यों है
इसी शून्य से..???
शून्य सा "मैं"
शून्य हो
देखता बस शून्य को,
अंत है इस शून्य में
तो हो रहे सब
शून्य क्यों...???
शून्य के गुणगान में
दिल हो रहा
अब शून्य है,
शून्य सा अवशेष मैं
बस खो गया
इस शून्य में....!!




"पंकज शर्मा"
खैर ( अलीगढ़ )
०९९२७७८८१८०

ईश्वरीय हिंदी....

किसी ने देखा नहीं
ईश्वर को
सुना ही था कि
काव्य और साहित्य में ही
ईश्वर मिलते हैं
रसखान की सरोज सप्तक
सूर की
साहित्य लहरी
मीरा के पद संकलन
और आज
हिंदी के इस
उनमुक्त परिदृश्य को देख
पहली बार
ऐसा लग रहा है
कि
कहने वाले
सच ही कहते हैं।


"पंकज शर्मा"

ब़े-गाना पन.......

और आज जब मुझे
जरूरत है
मेरे चहेतों की
तो ना जाने कहाँ खो गया
वो साथ
वो अपनत्व
ठीक उसी तरह जैसे
हो जाते हैं
गायब
सींग गधे के सिर से,
आज
सभी लोगों से
मुलाकात कर
36 का आँकड़ा" कहावत
चरित्रार्थ होती नजर आई,
क्या
माँ-बाप के बाद
सब ख़तम हो जाता है
अकस्मात् ही...??
क्यों
सब रिश्ते नाते
फीके और बेमानी
नजर आने लगते हैं..??
काश...,
किसी ने
जिम्मेदारी ली होती..,
काश...,
कुछ तो होता
हमारे दरम्यान्..!
आख़िर क्यों
मेरे वज़ूद को
उछाला गया ठोकरों पर
हर बार की तरह
इस बार भी...???
अब और
कितना दूर जाओगे
मेरी आवाज की भी एक सीमा है
पीछे मुड़ कर तो देखो
मेरे लिऐ नहीं तो
इन बच्चों के लिऐ
जो जी रहे हैं
मायूसी भरी जिंदगी।
यक़ीनन आपके जेह़न में
कहीं न कहीं तो
सहानुभूति होगी मेरे प्रति,
बस्स..,
एक बार
सिर्फ एक बार "मैं"
महसूस करना चाहता हूँ उसे,
हे ईश्वर..!
तू तो सब कर सकता है ना
तेरे बाद
अब कोई ठहरता भी तो नहीं
मेरे पास..,
शायद मेरे शरीर से
तन्हाई की "बू" आती है।
कहीं ऐसा ना हो
कि मेरी साँसें ही मुझ से
बग़ावत कर जाऐं।


"पंकज शर्मा"
खैर ( अलीगढ़ )
००९९२७७८८१८०

रविवार, 5 जुलाई 2015

ईश्वर की ओर......

आँखों के जब आगे छा रहा
अंधेरा घोर..,
लेकर प्रेम की बाती तो बढ़ो
श्याम की ओर..,
बढ़ो श्याम की ओर कि सब
संकट भागें दूर.,
हर संकट के आगे खड़ौ मेरौ
माखन मिस़री चोर..,

आओ चलें सब मिलकर उस
ईश्वर की ओर..,
कहते हैं सब उनको नटवर
नंद किशोर..,
नटवर नंद किशोर कि सब के
मन के मीत..,
बरसाने की राधा जिनकी
बन गयी चाँद चकोर..,

बंसी मधुर बजावै लै माथे
मुकुट मोर..,
हर धुन पर राधा नाचे हो मन में
भाव विभोर..,
मन में भाव विभोर कि
सबके प्राण प्रिय..,
आओ चले सब मिलकर उस
ईश्वर की ओर..,



"पंकज शर्मा"

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

मौत की मुस्कुराहट....

सफेद लिबास में लिपटी
वो अंजान सी
परछाईं
काली स्याह सड़क पर
चलती चली आती है अक़्सर
बे-ख़टक मेरी तरफ..,
कहने को तो
इंसानी रूहों का
कोई वज़ूद नहीं
मग़र
मैं हो जाता हूँ
बेबस
उसकी रूहानी ताकत के आगे
न जाने क्यूँ "वो"
जकड़ लेती है अक्सर
मुझे सम्मोहन रूपी पाश में..??
.
.
आज रात वह
फिर आयी
ख़्वाब में
और चुपके से
रख गयी
कुछ दर्द भरे लफ़्ज
झोली में मेरी...!
.
.
मैंने देखी
मौत की मुस्कुराहट
उसके चेहरे पर...,
सचमुच..
कितनी हँसी थी..!!
.
.
.
पंकज शर्मा
खैर (अलीगढ़ )
०९९२७७८८१८०

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

वक़्त की जंजीरें....

और इस तरह
वक़्त की
दुहाई देकर
कोई भला
छोड़कर जाता है
यूँ तन्हा
मँझदार में...,
सारे स्वप्न
अब तो
बिखर चुके हैं
सुनामी के बाद की
लहरों की तरह..,
.
मन करता है
नाचने का
पाकर तुम्हारी आहट,
बरबस ही
मुस्कुरा उठता है
ये
बारिश  के बाद
बने सतरंगी
इंद्रधनुष की तरह..,
और अब
मुरझा सा गया है
कम्बख़त
जरा ही देर में
तुम्हारे ओझल होते ही..,
नामुराद़
नज़्में भी अब तो
आँखों की
नमी से
सवाल करने लगी है..!
.
तुम कहते हो
कि "मैं"
श्रृंगार
क्यों नहीं लिखता..??
मैं कहता हूँ
कि
मेरे पास
कोई औचित्य तो हो
लिखने का..!
.
हमेशा ऐसी
घटती बढ़ती धड़कनों
के बीच
भला "मैं" कैसे
लिख सकता हूँ श्रृंगार..??
.
कहने को तो
जल ही जीवन है
मगर
नागफनी को भी
मुस्कुराते
देखा है बेतहाशा
मरुस्थल में..,
ठीक
इसी तरह
कल़म मोहताज़ नहीं है
नामुराद
वक्त के
चंद टुकड़ों की...!
वक्त की जंजीरें
अब नहीं
जकड़ सकती हैं
मेरे
अंतर्द्वंदित मन की
परिकल्पनाओं को..!
.
मेरी हर रचना
मेरे दिल
और
दिमाग में
उमड़ते
जज़्बातों का
दस्तावेजी प्रमाण है।
.
.
पंकज शर्मा
खैर (अलीगढ़ )
०९९२७७८८१८०

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

एक अंजान सफर की दास्तां...

वक्त के साथ मैं चलता
चला जा रहा हूँ
इक़ अंजान डगर पर
जहाँ
बिखरी पड़ी हैं
शैतानी पहेलियाँ....
पहेलियाँ बड़ी ही अज़ीबोगरीब
कोई
धर्म के नाम पर
तो कोई
जाति-वर्ण के नाम पर..,

हर शख्स की काया कल्पित
हथेलियों में
कुण्डली मार बैठी हैं
ये
विषैली पहेलियाँ..,
सामाजिक
बहुरूपिये भी
पिटारा लिऐ घूम रहे हैं
अबूझ पहेलियों का..
जिनसे
निकलती हैं वो
हैवानियत से भरी पहेलियाँ
जो लील जाती हैं
मासूम जिन्दगियाँ
तार तार कर देती हैं अस्मत्
बेटियों की..,

मेरी सभ्यता...! हाँ...हिन्दी सभ्यता
भी फँसी पड़ी है
पाश्चात्य रूपी पहेली के चंगुल में
वो
तड़प रही है
छटपटा रही है
और
देख रही है
अपने वज़ूद का क़त्ल होते हुऐ
माँ भारती
आतुर है
अपनी संस्कृति के
चंद अवशेषों के साथ
खुले आसमां में साँस लेने को.....!!

ये है मेरे
अंजान सफ़र की दास्तां....!!

"पंकज शर्मा"

मंगलवार, 24 मार्च 2015

"वक़्त की मार"

मैं मिलकर आया हूँ
उन
हुक़्मरानों से
जो
वक़्त को
तरज़ीह नहीं देते
वे कहा करते थे
अक्सर
कि
वक़्त
खूँटी से बँधी
जाग़ीर है उनकी
मग़र आज
वो
कर रहे हैं इंतजार
झौंपड़-पट्टी में बैठ
वक़्त के
बदलने का

ना-मुराद़..
बेखब़र थे वक़्त की मार से....!!

......पंकज शर्मा

सोमवार, 16 मार्च 2015

"मासूम तितलियाँ"

कभी कभी इन काली स्याह
रातों में
जब सब आवाजें
सो जाती हैं
तो
टिक..टिक..टिक..
करते
घड़ी के काँटे
ले जाते हैं
कहीं दूर... अतीत की बगिया में
जहाँ
फुदक रही होती हैं
कुमुदनी
के फूल पर
यादों की तितलियाँ..,

तितलियाँ...जब
पंख
फड़फड़ाती हैं तो
मैं
देखता हूँ
गर्द़ की चादर को उड़ते हुऐ
जो
मेरे और अतीत के
बीच तनी थी
तितलियाँ खेल रही हैं
आँख-मिचौली
झूम रही हैं भँवरों के संग
कूदती हैं
कुमुदनी से चमेली पर बे-खटक

बगिया महक रही है फूलों
की गंध से
तभी
नोंच दिये पंख काफ़िरों ने
तड़प उठीं
तितलियाँ
रो पड़ा आसमां
कुमुदनी
मूर्छित है
चमेली भिगो रही है
आँसुओं से गालों को उसके

आज फिर...रो उठा
मैं.., जाकर
अतीत के उपवन में..!

टिक..टिक..टिक..
काँटे
भाग रहे हैं अनवरत्
और
मैं ढूँढ़ रहा हूँ
तकिये
के नीचे
वो मासूम तितलियाँ...!!

......पंकज शर्मा

गुरुवार, 12 मार्च 2015

"हिन्दी और ऊर्दू"

आज रात (06-03-2015) मेरे शहर में होली मिलन समारोह के उपलक्ष्य में मुस्लिम भाइयों की तरफ से "अखिल भारतीय कवि सम्मेलन" का सफल आयोजन हुआ..,

शुक्रिया उस "मुस्लिम आवाम" का जिसके नाम पर अक्सर कद्दावर नेती गंदी राजनीति करते रहते हैं...!

एक ही मंच से "हिन्दी और ऊर्दू" का समायोजन अभूतपूर्व रहा.....!



आज रात मैंने देखा
ऊर्दू को
खिलखिलाते हुए
हिन्दी औ ऊर्द़ू झूम रही थीं
बाँहों में बाँहें डाल
लग रहा था
कि जैसे
नफ़रत के मेले में,
बिछड़ी
दो बहनें
आँखों में खौफ़ लिऐ बढ़ रही हों
मिलने गले..,

कदम ताल करते हुऐ
ग़जल और दोहे
बढ़ते
चले जा रहे थे
राजपथ पर
झुमरी तलैया के पास
कविताऐं
नाच रहीं थीं
मुशायरों के संग...,

मैं देख रहा था
चमकती
आँखों से होली पर
इस
अद्भुत मिलन
को
ऊर्दू सुबक रही थी
हिन्दी की उपमाऐं
सहला
रही थी भीगी आखों से
बालों को उसके
बसंत
अठखेलियाँ कर रहा था खुले आसमां में...,

इतिहास ग़वाह है ग़र "हिन्दी"
ज़िस्म
तो
ऊर्दू ऱूह है उसकी..,
मगर
आपसी द्वेष,
सामाजिक कुरीतियों
और
राजनैतिक पाटों के बीच
रौंदी गयी
अस्मत् दोनों की..,

आज ऊर्दू की "ऱूह"
समा चुकी थी
हिन्दी के "ज़िस्म" में
माँ
भारती मुस्कुरा रही थी
देखकर
खुले चौबारे में दोनो "बेटियों"
का ये
अद्भुत मिलन

मैं
बस..
बस्स...,
इतना कहूँगा...
ऐ होली....! तेरे आने का शुक्रिया

"जय हिन्द"

.......पंकज शर्मा

बुधवार, 11 मार्च 2015

"माँ" सम्पूर्ण विज्ञान

परमाणु है पदार्थ की
मूलभूत इकाई
मगर
उसके होने का श्रेय जाता है
तीन मौलिक कणों
इलेक्ट्राॅन
प्रोटाॅन
और न्यूट्रोन को
सुना है इलेक्ट्राॅन चलायमान है
नाभिक के
चारों ओर

ठीक उसी तरह
मैं देखता हूँ
पृथ्वी, आकाश, पाताल
और
पूरी सृष्टि को घूमते हुऐ
इलेक्ट्राॅन
की मानिन्द्
माँ
रूपी नाभिक के चारों तरफ

अतिश्योक्ति नहीं होगी
अगर मैं कहूँ
कि पूरा
ब्रह्माण्ड
ऊर्जान्वित् होता है
उस "माँ" में उपस्थित ऊर्जा
अर्थात्
नाभिकीय ऊर्जा से

नाभिक की अपार ऊर्जा से
तो आप
परिचित होंगे ही ना
भली-भाँति...!!

"पंकज शर्मा"

मंगलवार, 10 मार्च 2015

"विज्ञान से परे"

न्यूटन ने बताया
हर वस्तु
अग्रसर है पृथ्वी की ओर
पानी की बूँदें
टप टप
कर टपकती हैं
गुरुत्वाकर्षण की वजह से..,
फिर क्यों
झूलता रहता है
हर कोई
बिना पंखों के
प्यार के खुले आसमां में...??

क्या "प्यार" अपवाद् है
न्यूटन
के नियम का..??
या है
बिना वज़ूद के
द्रव्यमान रहित..??

चलो....सोच कर ज़वाब दे
देना
तुम्हारा
निरुत्तर होना ठीक नहीं है।

.......पंकज शर्मा

बेचारे पेड़

एक चीख़....बड़ी ही दर्दनाक्
अक्समात्
मेरे कानों तक पहुँची..
सिहर उठा
मैं
सुनकर अंदर तक..,
चीख़ रहा था बेतहाशा
इक़
छोटा पौधा
जो चढ़ रहा था सीढ़िया
यौवन की
झर झर झर
काँप रही थीं पत्तियाँ...!

चेहरे पर कुत्सित् मुस्कान लिऐ
आदमजात्
चमका रहा था कुल्हाड़ी
पत्थर के
काले टुकड़े से...

ओह....
कितना खतरनाक वार...!
बंद
हो गयीं चीखें...
हो गया बंद
झरझराना पत्तियों का
हैरां सा
गिर गया "वो"
लिऐ अनेकों प्रश्न चिह्न ज़ेहन में..??

गूँज उठा
राक्षसी अट्ठाहस
पर्यावरण में....!

......पंकज शर्मा